क्यों बातों में ले आये हो,
ज़हर भरा ये कड़वापन,
कहाँ छोड़कर आये हो,
अपना प्यारा वो पागलपन,
धीरे धीरे हाथ हमारा,
क्यों छोड़ रहे हो ऐसे,
तारा कोई टूट रहा हो,
आसमान में जैसे,
पहले जब तुम हाथ हमारा,
थाम के बैठा करते थे,
इज़हार-ऐ-मोहब्बत की बातें,
इक दूजे से करते थे,
किन्तु अब वो वक़्त कभी,
फिर लौट न आयेगा,
न मीरा के जैसी प्रेम की भक्ति,
न कबीरा कोई बन पायेगा.
.......ओपिन्द कुमार......
ज़हर भरा ये कड़वापन,
कहाँ छोड़कर आये हो,
अपना प्यारा वो पागलपन,
धीरे धीरे हाथ हमारा,
क्यों छोड़ रहे हो ऐसे,
तारा कोई टूट रहा हो,
आसमान में जैसे,
पहले जब तुम हाथ हमारा,
थाम के बैठा करते थे,
इज़हार-ऐ-मोहब्बत की बातें,
इक दूजे से करते थे,
किन्तु अब वो वक़्त कभी,
फिर लौट न आयेगा,
न मीरा के जैसी प्रेम की भक्ति,
न कबीरा कोई बन पायेगा.
.......ओपिन्द कुमार......
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