Poetry
Saturday, 25 February 2017
"लिखो नया तुम गीत कोई"
न पढ़ा हो ऐसा गीत कोई,
लिखो नया तुम गीत कोई,
शब्द शब्द खामोश रहें,
मतलब हो तूफ़ानी,
पढ़ने वाला पढता जाये,
भरे आँख में पानी,
सहज सरल हो पंक्ति सारी,
कहे अनसुनी कहानी,
सागर जैसी गहरी हों,
मौजों की हो रवानी,
शब्दों का न हो मोल कोई,
लिखो नया तुम गीत कोई...
..........ओपिन्द.........
अच्छा नही लगता....
यूँ मुझसे दूरियाँ बढ़ाना अब अच्छा नही लगता,
हाल-ए-दिल अपना सुनाना अब अच्छा नही लगता,
तुम ही कहे थे नही कोई दूसरा है तुमसा,
तुम्हें भी बेवफा बताना अब अच्छा नहीं लगता....
....................ओपिन्द कुमार.........
हाल-ए-दिल अपना सुनाना अब अच्छा नही लगता,
तुम ही कहे थे नही कोई दूसरा है तुमसा,
तुम्हें भी बेवफा बताना अब अच्छा नहीं लगता....
....................ओपिन्द कुमार.........
कुछ अलग सी लगी.....
इस जहाँ में मुझे तुम कुछ अलग सी लगी,तेरी बातें मुझे फ़लक सी लगी,नही जानता क्यों तुझे याद मैं करने लगा,मेरी ही दीवानगी मुझे कुछ अलग सी लगी.......................ओपिन्द कुमार.................
Saturday, 18 February 2017
क्या लिखूं
सोचता हूँ कि तुझपर कोई किताब लिखूँ मैं,तेरी ये क़ातिल अदा, तेरी हर बात लिखूँ मैं,
तेरे आँखों को मधुशाला, होंठो को शराब लिखूँ मैं,तेरे दीदार का हिसाब या तेरे बालों का खिज़ाब लिखूँ मैं,
तेरे बदन की खुशबु या खुद का खिंचाव लिखूँ मैं,आ तुझको किसी शेर का जवाब लिखूँ मैं, .....ओपिन्द....
कहाँ गया वो प्यार तुम्हारा
कहाँ गया वो प्यार तुम्हारा,
जब मैं था सारा संसार तुम्हारा,
मेरे हाथों में तुम हाथ थे देते,
और कहते न छूटे ये साथ हमारा,
जब मैं था सारा संसार तुम्हारा,
मेरे हाथों में तुम हाथ थे देते,
और कहते न छूटे ये साथ हमारा,
तौल दिया तूने प्यार को मेरे,
नये पुराने के दस्तूरों में,
अब न रहा मैं प्राण सा प्यारा,
कहाँ गया वो प्यार तुम्हारा,
सूरज कैसे प्रकाश बिखेरे,
जब ग्रहण सा उस पर हो अँधियारा,
इसी हाल में है प्यार हमारा,
कहाँ गया वो प्यार तुम्हारा,
हम मिलेंगे तुम मिलोगे,
प्यार भरी कुछ बातें होंगी,
टूट गया सब ख्वाब हमारा,
कहाँ गया वो प्यार तुम्हारा...
......ओपिन्द कुमार...
Monday, 13 February 2017
मेरी बाँहों में आ जाओ,
मेरी बाँहों में आ जाओ,
तुम्हें महसूस कर लूँ मैं,
है जो फासला मुझसे तेरा,
वो दूर कर लूँ मैं,
दिल भरता नहीं मेरा,
तेरा दीदार करने से,
तुझे जड़वा कर शीशे में,
ख्वाहिश हैं पास रख लूँ मैं,
बन गए हो तुम ऐसी आदत,
जिसे पाऊँ न तो तड़पूँ मैं,
मरुथल सा हूँ मैं प्यासा,
तुम्हें पीने को तड़पूँ मैं,
कोई कितना भी कुछ कर ले,
पर ऐसा हो नही सकता,
कि दिल में है जो जगह तेरी,
किसी को और दे दूँ मैं,
बस इतनी सी इल्तिज़ा तुमसे,
सदा मेरी ही रहना तुम,
मुझसे दूर न होना,
कहीं कुछ कर न बैठूं मैं,
.......ओपिन्द...
तुम्हें महसूस कर लूँ मैं,
है जो फासला मुझसे तेरा,
वो दूर कर लूँ मैं,
दिल भरता नहीं मेरा,
तेरा दीदार करने से,
तुझे जड़वा कर शीशे में,
ख्वाहिश हैं पास रख लूँ मैं,
बन गए हो तुम ऐसी आदत,
जिसे पाऊँ न तो तड़पूँ मैं,
मरुथल सा हूँ मैं प्यासा,
तुम्हें पीने को तड़पूँ मैं,
कोई कितना भी कुछ कर ले,
पर ऐसा हो नही सकता,
कि दिल में है जो जगह तेरी,
किसी को और दे दूँ मैं,
बस इतनी सी इल्तिज़ा तुमसे,
सदा मेरी ही रहना तुम,
मुझसे दूर न होना,
कहीं कुछ कर न बैठूं मैं,
.......ओपिन्द...
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